कैलाश मानसरोवर यात्रा 2021

कैलाश मानसरोवर यात्रा 2021

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कैलाश तिब्बत के पर्वत मालाओ के बीच बसा है। कैलाश को दुनिया का केंद्र बिंदु और भगवान शिव और देवी पार्वती का निवास स्थान माना जाता है। कैलाश पर्वत पर पहुंचना बेहद ही कठिन होता है लेकिन यहाँ तक पहुंचना अपने आप में जीवन की एक बड़ी उपलब्धि है। सदियों से देव, दानव, मुनि, योगी और सिद्ध पुरुष यहाँ तपस्या करने आते है। प्राचीन ग्रंथो में उल्लेख है की हिमालय जैसा कोई पर्वत नहीं है, यहाँ भगवान का निवास है क्योंकि यहाँ कैलाश और मानसरोवर स्थित है।

हिन्दू धर्म में कैलाश और मानसरोवर को पवित्र तीर्थ स्थल के रूप में माना जाता है। हिन्दुओं के आलावा बौद्ध और जैन धर्म में भी पवित्र तीर्थ स्थान माना जाता है। पौराणिक मान्यताओं के अनुसार यह कुबेर की नगरी है। कैलाश पर्वत समुद्र तल से लगभग 22028 फ़ीट ऊँचा है। कैलाश पर्वत में आज तक कोई नहीं जा सका है। कैलाश को दुनिया का केंद्र बिंदु कहते हैं , यह हिमालय के उत्तर में स्थित है जिसे तिब्बत कहते हैं, और तिब्बत चीन के आधीन है इसलिए यात्रा के लिए चीन का सहयोग लेना पड़ता है।

यात्रा के लिए हर साल भारत का विदेश मंत्रालय नागरिकों से आवेदन मांगता है।  चुने हुए लोगों को यात्रा की अनुमति होती है। यात्रियों के कागज की जांच, डॉक्टरों की जाँच प्रक्रिया में 3 दिन लग जाते है।  हर यात्री का दिल्ली  में चेकअप होता है। कैलाश मानसरोवर यात्रा एक धार्मिक यात्रा है, किन्तु ये बहुत ऊंचाई वाली यात्रा है, इस यात्रा को करने में सीरियस इलनेस हो सकती है, या हार्ट फेलियर हो सकता है या ब्रेन के अंदर ऑक्सीजन की कमी हो सकती है।  इसलिए इस यात्रा को शुरू करने से पहले पूरा मेडिकल टेस्ट अनिवार्य होता है।

कैलाश मानसरोवर यात्रा मार्ग

Almora
Almora

वैसे तो कैलाश जाने के कई रास्ते हैं, परन्तु भारत में उत्तराखंड के कुमाऊं जिले से कैलाश मानसरोवर यात्रा शुरू होती है। यात्रा के लिए हर साल कैलाश जाने के लिए अपने सारे सामान को बोरों में बांधना बहुत जरुरी है, क्योंकि सारा सामान आगे के पहाड़ी रास्तो में खच्चर पर लाद कर जाएगा। यात्रा शुरू करने से पहले सभी यात्रियों का वैदिक मन्त्र उच्चार और शंख ध्वनि से स्वागत किया जाता है। कैलाश मानसरोवर का सफर दिल्ली से शुरू होता है, और नैनीताल में कुमांऊ मंडल विकास निगम द्वारा स्वागत होता है। अल्मोड़ा जिले में आपको आराम करना होगा। अल्मोड़ा से आगे गोलू देवता का मंदिर है, जो की यहाँ बहुत ही प्रसिद्ध मंदिर है। ऐसा माना जाता है की गोलू देवता के मंदिर में की हुई फरियाद बहुत जल्द पूरी होती है।

कैलाश मानसरोवर यात्रा का संचालन ITBP मुख्य रुप से करती है।

ITBP Camp Mirthi
ITBP Camp Mirthi

मिर्थी के ITBP कैंप पहुँचने पर, ITBP के जवान यात्रियों का स्वागत करते हैं। चीन से लगी सीमा की रखवाली का जिम्मा इसी अर्धसैनिक बल का है। कुमाऊं मंडल विकास निगम, इंडो तिब्बतन बॉर्डर पुलिस ही इस कैलाश मानसरोवर की यात्रा का संचालन करती है। ITBP के अधिकारी यात्रा से सम्बंधित जरुरी जानकारी देते है। ITBP इस यात्रा के दौरान 4 कार्य करती है – मेडिकल सुविधा देना, कम्युनिकेशन प्रोवाइड करना , सिक्योरिटी और डिजास्टर होने पर उचित कार्यवाही करना। मिर्थी ITBP कैंप में देवी का मंदिर है, यहाँ दर्शन करना एक अनोखा अनुभव होता है।
अल्मोड़ा से धारचूला पहुँचने के बाद आगे की यात्रा अगले दिन शुरू होती है। धारचूला नेपाल और तिब्बत से जुड़ा इलाका है, जिसके पास काली नदी बहती है। धारचूला के बेस कैंप पर सभी यात्रियों का स्वागत होता है। रात में कुमाऊं विकास मंडल विकास निगम के रेस्ट हाउस में आराम करे। यहाँ पर यात्रियों के सामान का वजन होता है। केवल 25 किलो वजन आप ले जा सकते है, अतिरिक्त वजन होने पर अलग से चार्ज होता है।

Sirkha
Sirkha village

अगले दिन सिरखा गाँव के लिए प्रस्थान करते हैं। सिरखा जाते वक़्त बीच में नारायण आश्रम आता है, यहाँ से आगे के लिए पैदल यात्रा शुरू होती है। सिरखा के KMVN रेस्ट हाउस में रात को रुकते हैं।
अगले दिन सिरखा से आगे गाला गाँव की यात्रा शुरू होती है। यहाँ पूरा पहाड़ी रास्ता है, यात्रियों को स्थानीय लोग रास्ता दिखाते हैं। स्थानीय लोग काफी मिलनसार होते हैं, खाने पिने की व्यवस्था गांव के लोग करते हैं, इन्ही से इनकी रोजी रोटी चलती है। रास्ते में बेहद दुर्लभ पेड़ पौधे देखने को मिलते हैं। पूरा रास्ता ऊँचे पहाड़ और गहरी खाइयों से भरा है। गाला में पहुँचने पर सुरक्षा बल स्वागत करते हैं और वो आगे जाने के लिए जरुरी सुरक्षा निर्देश देते हैं। रात्रि विश्राम गाला में होता है।

अगला पड़ाव बुधि गांव के लिए है। रास्ते में 4444 ढलानदार सीढ़ियों का रास्ता है जो काफी खतरनाक है, गहरी खाई पूरे रास्ते में है। रास्ते में लखनपुर और माल्पा गांव है। 1998 में माल्पा गांव में कैलाश मानसरोवर यात्रा का सबसे बड़ा हादसा हुआ था, मालपा में बादल फटा था जिसमे 300 यात्रियों की मौत हो गई थी। रास्ते में प्राकृतिक झरने जगह-जगह देखने को मिलेंगे। पूरे रास्ते में काली नदी साथ चलती है। बुधि गांव पहुँचने पर रात यही विश्राम करना होता है।

Garbayang
Garbayang

अगले दिन गुंजी के लिए प्रस्थान करना होता है। ३ किलोमीटर की चढ़ाई के बाद छियालेख घाटी आती है, प्राकृतिक नजारे देखने से मन को सुकून प्राप्त होता है। यहाँ नाश्ता करने के बाद आगे बढ़ते है। छियालेख घाटी आने के बाद चेकपोस्ट पड़ता है जहाँ पासपोर्ट चेक किया जाता है। रास्ते में ग्राबायाँग गांव पड़ता है जिसे धंसता हुआ गांव भी कहते हैं, ये गांव 300 से 400 साल पुराना है। गांव के सभी घर पत्थर से बने है जिनपर नक्कासी की गई है। परन्तु गांव में बहुत कम लोग है। ये गांव लगातार धंस रहा है, जिससे आने वाले समय में कोई बड़ा हादसा हो सकता है। पुराने समय में यह गांव भारत और चीन का व्यापारिक केंद्र था।
गर्बयांग गांव से आगे 7 किलोमीटर चलने के बाद गुंजी गांव पड़ता है। गुंजी गांव में आराम करने के लिए दो दिन ठहरना होता है। गुंजी गांव में दूसरे दिन मेडिकल चेकअप होता है जो दिन भर चलता है। गुंजी के स्थानीय लोगो को जड़ी बूटियों की बहुत जानकारी है, यही इनकी रोजी रोटी है।

कैलाश मानसरोवर यात्रा का अंतिम भारतीय पड़ाव- नवीढांग

गुंजी में दो रात एक दिन गुजारने के बाद अगला पड़ाव नवीढांग है। नवीढांग कैलाश मानसरोवर यात्रा का अंतिम भारतीय पड़ाव है। गुंजी से कालापानी 9 किलोमीटर है। कालापानी काली नदी का उद्गम स्थान है, यहाँ से वेदव्यास जी की गुफा भी दिखाई देती है।

om parvat
Om Parvat

कैलाश मानसरोवर की पूरी यात्रा में ITBP के जवान साथ रहते हैं, जो सुरक्षा के साथ सेवा भी करते हैं। रास्ते में शेषनाग पर्वत के दर्शन होते है। आगे चलकर ॐ पर्वत के दर्शन होते है। ॐ पर्वत को देखकर लगता है, जैसे किसी ने पहाड़ में चढ़कर उसे तराशा हो।
गुंजी 10300 फ़ीट की पर है परन्तु नवीढांग 16400 फ़ीट की ऊंचाई पर है। रात नवीढांग में गुजारनी है, और रात को 2 बजे लिपुलेख के लिए निकलना है। यात्रा में समय की खास अहमियत होती है। भारत और चीन के समय में ढाई घंटे का फर्क है । इसीलिए भारतीय सैनिक के मुताबिक 7 बजे तक लिपुलेख पहुंचना होता है, क्योंकि थोड़ी सी भी देर हुई तो तेज धूप निकलने से बर्फ पिघलनी शुरू हो जाएगी साथ ही तेज हवाओं के झोंके इस यात्रा को और कठिन बना देंगे।

कैलाश की परिक्रमा का केंद्र- दारचेन 

Lipulekh Darra
Lipulekh Darra

लिपुलेख पहुँचने पर चीन के अधिकारी आगे की यात्रा सँभालते है। लिपुलेख दर्रा 16640 फ़ीट की ऊंचाई पर है। लिपुलेख में पासपोर्ट की जाँच होती है। लिपुलेख से आगे 2 किलोमीटर चलने के बाद बस से चीनी शहर तकलाकोट पहुंचा जाता है।आगे बढ़ने पर बुरांग नाम का शहर पड़ता है जो भारत और चीन के बीच व्यापार का एक अहम् केंद्र है। रात बुरांग में ही रुकना है। अगले दिन बुरांग में इमिग्रेशन की जाँच होती है। बुरांग से अगले दिन दारचेन के लिए यात्रा शुरू होती है। दारचेन व्यापार का एक बड़ा केंद्र है, तिब्बत के लोग यहाँ व्यापार के लिए आते हैं। दारचेन को कैलाश की परिक्रमा का केंद्र कहा जाता है, यहीं से कैलाश पर्वत की 54 किलोमीटर की परिक्रमा शुरू होती है।

Gaurikund
Gaurikund

रास्ते में यमद्वार आता है यहीं से कैलाश पर्वत के लिए पैदल परिक्रमा शुरू होती है। आगे बढ़ने पर बौद्ध मठ देराफुक पड़ता है, जिसकी स्थापना तिब्बती लामा गुइसंपा ने 700 साल पहले की थी। देराफुक 17000 फ़ीट ऊपर है, यहाँ से कैलाश पर्वत की पहली झलक दिखाई देती है। देराफुक में रात बिताने के बाद, अगले दिन दुर्गम और खतरनाक डोलमा दर्रे से होकर जोगजरफु पहुंचना होता है। रास्ते में गौरीकुंड के दर्शन होते है, गौरीकुंड से 29 किलोमीटर चलने पर जोगजारफू पहुँचते है। जोगजारफू से परिक्रमा करने के बाद वापिस दारचेन आते है।

Mansarovar Lake
Mansarovar Lake

कैलाश परिक्रमा के बाद दारचेन से ही मानसरोवर की परिक्रमा शुरू होती है। मानसरोवर के चारो और कई मठ है। मानसरोवर परिक्रमा में अगला पड़ाव कुगु मठ है। यहाँ से मानसरोवर झील बहुत पास में है इसलिए रात कुगु मठ में रुकते हैं । मानसरोवर परिक्रमा में आगे चलने पर सिउ ची नदी दिखाई देती है, जो की मानसरोवर नदी को राक्षस ताल नदी से जोड़ती है। माना जाता है कि राक्षस ताल के किनारे रावण ने भगवान शिव की कठिन तपस्या की थी। राक्षस ताल का पानी कभी नही पीना चाहिए। राक्षस ताल में मानसरोवर परिक्रमा समाप्त होती है। यहाँ से यात्रा वापसी के लिए शुरू होती है। वापस लौटने का रास्ता वही होता है जो यहाँ तक पहुँचने का था।

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