चारधाम यात्रा कैसे करें- चारधाम यात्रा का सम्पूर्ण विवरण

चारधाम यात्रा कैसे करें- चारधाम यात्रा का सम्पूर्ण विवरण

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चारधाम यात्रा सबसे अद्भुत और दिव्य यात्रा है। आप भी इस यात्रा में शामिल होकर अपना जीवन धन्य करें। चारधाम यात्रा उत्तराखंड में हिन्दू धर्म के 4 सबसे पवित्र मंदिरों की यात्रा है। चारधाम के नाम है- यमुनोत्री, गंगोत्री, बद्रीनाथ और केदारनाथ।

Har ki Pauri
Har ki Pauri

हर की पौड़ी: चारधाम यात्रा हरिद्वार से शुरू होती है – हरिद्वार को चारधाम का मुख्य प्रवेश द्वार माना जाता है। हरिद्वार में हर की पौड़ी सबसे प्रमुख स्थानों में से एक है। हजारों भक्त यहाँ पवित्र गंगा नदी में स्नान करते हैं और पापों से हमेशा के लिए मुक्ति पा लेते हैं। हर का अर्थ है भगवान शिव, और पौड़ी का अर्थ है चरण। ऐसा माना जाता है कि वैदिक काल में भगवान शिव और भगवान विष्णु ने हर की पौड़ी में स्थित ब्रह्मकुंड का दौरा किया था। हर की पौड़ी वह जगह है जहाँ हजारों भक्त इकट्ठा होते हैं, और यहीं से १२ वर्ष में लगने वाले कुंभ मेले की शुरुआत होती है। गंगा आरती सूर्यास्त के समय होती है। गंगा अभिषेक आरती से पहले होता है। गंगा अभिषेक के बाद, सभी यात्रियों और तीर्थयात्रियों को गंगा को स्वच्छ रखने और उसकी शुद्धता के लिए शपथ दिलाई जाती है। इसके बाद सभी ने गंगा माता की जय का जाप किया, जो वातावरण को सकारात्मक ऊर्जा से भर देता है। गंगा आरती का अर्थ है माँ गंगा की पूजा। पुजारी अपने हाथ में बड़े दीपक रखते हैं, और सभी जगह से मंत्रोच्चार सुनाई पड़ते है। लोग मिट्टी के दीयों को आशा और उम्मीद के प्रतीक के रूप में जलाते हैं और गंगा नदी में प्रवाहित करते हैं।

Kemptyfall
Kemptyfall

केम्पटी फॉल यमुनोत्री की यात्रा का पहला पड़ाव है, ये मसूरी के निकट है। ये फॉल पानी की दूधिया धाराओं के लिए जाना जाता है। यात्रा शुरू होने से पहले आप इस इस स्थान पर रुक कर हर तनाव से मुक्ति पाते हैं। केम्पटी फॉल में नीचे फॉल तक जाने के लिए रोपवे का सहारा लेना पड़ता है।
लखमण्डल एक प्राचीन शिव मंदिर है जहाँ यमुना नदी की पहली झलक देखने को मिलती है। लखमण्डल मंदिर शक्ति पंथो में बहुत लोकप्रिय है, जो विश्वास करते हैं कि इस यात्रा से उनके सभी दुर्भाग्य समाप्त हो जाएंगे। स्थानीय लोगो के अनुसार, इस स्थान पर महाभारत में दुर्योधन ने पांडवो को जिन्दा जलने की साजिश की थी। लखमण्डल का अर्थ है, लख- कई , मंडल- मंदिर या लिंगम। 2001 की खुदाई में बहुत से शिवलिंग पाए गए। ये माना जाता है की अभी भी बहुत से शिवलिंग नीचे हैं।इसके बाद यमुनोत्री की यात्रा शुरूहोती है।

आप बरकोट (यमुना नदी के तट पर) में एक होटल या रिसॉर्ट में रह सकते हैं। यमुना का पानी बहुत शुद्ध है, यहाँ के स्थानीय लोग यमुना का ताज़ा पानी पीते हैं। आप यमुनोत्री के लिए एक खच्चर की सवारी कर सकते हैं। जानकीचट्टी से यमुनोत्री तक 5 किलोमीटर की ट्रेक है। जिसे आप खच्चर में या पैदल चलकर तय कर सकते हैं। पैदल चलने में 3 घंटे और खच्चर से 2 घंटे लगते हैं। ट्रैकिंग मार्ग अच्छी तरह से संरक्षित हैं। सुबह की रोशनी में ट्रेक शुरू करना उचित है क्योंकि उस समय मौसम सुहावना होता है और आप मंदिर की भीड़ से बच सकते हैं। मंदिर के पास सड़क में पूजा का सामान बेचा जाता है, खाने-पीने के लिए रेस्टोरेंट और ढाबे उपलब्ध हैं।

चारधाम यात्रा का पहला धाम

यमुनोत्री पवित्र यमुना नदी का उद्गम स्थान है। देवी यमुना को समर्पित यमुनोत्री मंदिर हिमालय पर्वत माला की घने जंगल के बीच 3300 मीटर की ऊंचाई पर स्थित है। यमुनोत्री मंदिर चारधाम यात्रा का पहला धाम है। मंदिर को अक्षय तृतीया जो की आमतौर पर मई में होता है पर खोला जाता है और यम द्वित्य पर बंद किया जाता है, जो दिवाली के बाद दूसरे दिन होता है। यमुना नदी का वास्तविक उद्गम कालिंद पर्वत पर स्थित एक ग्लेशियर है जो मंदिर से ऊपर 4400 मीटर की ऊंचाई पर स्थित है। लीजेंड कहते है की यमुनोत्री वह स्थान है जहाँ ऋषि आशित मुनि जी रहते थे। ऋषि ने अपनी प्रारंभिक जीवन के दौरान गंगा और यमुना दोनों नदिओं में स्नान किया, जैसे जैसे वह बूढ़े होते गए वो गंगा में डुबकी लगाने के लिए गंगोत्री तक पहुँचने में असमर्थ होते गए। उनके इस प्रबल विश्वास से प्रभावित होकर देवी गंगा यमुना नदी के बगल में एक धारा के रूप में उभर आई जिससे ऋषि को अपने दैनिक अनुष्ठानो को जारी रखने में सहायता मिल सकी। देवी यमुना भगवान सूर्य और देवी संज्ञा (जिन्हे चेतना की देवी भी कहते है) की पुत्री है, और यम की बहन (मृत्यु के देव) है। भक्तो की मान्यता है कि यमुना नदी में डुबकी लगाने से पीड़ा रहित मृत्यु होती है, और भगवान सूर्य का आशीर्वाद मिलता है।

Yamunotri Dham
Yamunotri Dham

वास्तुकला की दृष्टि से मंदिर का निर्माण नागर शैली में किया गया है। मंदिर ग्रेनाइट के पथरो से बनाया गया है। मंदिर में एक मुख्य शंक्वाकार आकार की मीनार है, जिसके नीचे देवी यमुना की प्रतिमा विराजित है। प्रतिमा पॉलिशड एबोनी संगमरमर से बनी हुई है, जिसमे महीम नक्काशी की गई है। मूर्ति एक कछुए के ऊपर विराजमान है, जिसको प्राचीन ग्रंथो में देवी यमुना का प्रतिनिधि माना गया है। उसके बगल में देवी गंगा की एक सफ़ेद पत्त्थर की मूर्ति खड़ी है। यमुनोत्री में गर्म पानी के झरने मौजूद है, जो थके हुए यात्रियों को राहत प्रदान करते है। सूर्यकुंड में उबलता हुआ गर्म पानी है, जबकि गौरी कुंड में स्नान के लिए उपयुक्त पानी है। तीर्थयात्री गौरी कुंड में स्नान करते है ताकि अपने पापों को धो सके और इस थका देने वाली यात्रा में आराम पा सके। सूर्य कुंड के जल में लोग आलू और चावल पकाते है। सूर्य कुंड का जल आलू चावल पकने के लिए पर्याप्त होता है।मंदिर के प्रवेश द्वार पर आलू चावल के छोटे छोटे बैग बेचे जाते है। गर्म पानी के कुंड में 5 मिनट तक आलू चावल के बैग को पकाया जाता है, जिसे श्रद्धालु प्रसाद के रूप में घर ले जाते है। इसके ऊपर हिमालय, दांये ओर मंदिर और नीचे यमुना नदी बहती हुई बहुत सुन्दर द्रश्य लगता है। 

Harshil
Harshil

गंगोत्री मार्ग पर गंगनानी नाम का छोटा सा शहर है, जो गर्म पानी के झरने के लिए प्रसिद्ध है। गंगनानी में गर्म पानी का झरना ऋषिकुंड कहलाता है। अधिकांश भक्त गंगोत्री जाने से पहले इस कुंड में डुबकी लगाते है। गंगनानी में स्थित एक मंदिर, वेदव्यास के पिता ऋषि परिसर को समर्पित है। गंगोत्री जाने वाले रास्ते में हर्षिल स्थान पड़ता है। हर्षिल में रात को रुकना है।

हर्षिल शांति और शांति लिए उत्तराखंड राज्य में हिमलाय की गोदी में बसा पवित्र जगह है। यह भागीरथी नदी के तट पर स्थित है। हर्षिल का खूबसूरत गांव ECO टूरिस्म को प्रोत्साहित करता है। सर्दियों के दौरान जब गंगोत्री बर्फ से ढक जाती है, तब देवी गंगा को मुखबा गांव तक लाया जाता है जो हर्षिल से सिर्फ 1km दूर है। भक्त सर्दियों में गंगा जी के इस निवास में जाकर उनका आशीर्वाद ले सकते है। अगले दिन गंगोत्री की यात्रा प्रारम्भ करे।

चारधाम यात्रा का दूसरा धाम

गंगोत्री जाने वाली सड़क हिमालय और हरे भरे जंगलो से घिरी हुई है। गंगोत्री मंदिर पहुँचने के लिए आपको पार्किंग से 1km पैदल चलना होगा। मंदिर के मार्ग में दुकानों पर खाली बोतले बेचीं जाती है, जिसमे भक्त लोग गंगा जल भर के ले जाते है। गंगा जल को सबसे पवित्र जल माना जाता है। दुकानो में पूजा का सामान और हस्तशिल्प भी बेचे जाते है। नाश्ते और खाने की छोटी दुकाने भी उपलब्ध है। 15-20 मिनट चलने के बाद आप गंगोत्री मंदिर के गेट तक पहुँच जाओगे। गंगोत्री मंदिर का लोगो के जीवन में महत्वपूर्ण धार्मिक महत्त्व है क्योंकि पवित्र गंगा नदी यहीं से निकलती है। गंगोत्री चारधाम यात्रा का दूसरा धाम है।

Gangotri Dham
Gangotri Dham

गंगोत्री मंदिर जनता के लिए अप्रैल या मई में अक्षय तृतीया के दिन खुलता है। मंदिर दिवाली के दिन बंद हो जाता है, जो सर्दियों के मौसम की शुरुआत का संकेत देता है। विपरीत मौसम के कारण नवम्बर से अप्रैल तक मंदिर बंद रहता है। वास्तुकला की दृष्टि से मंदिर बहुत साधारण है। मंदिर का निर्माण सफ़ेद संगमरमर के पत्थरो से किया गया है। गंगोत्री मंदिर का निर्माण गोरखा जनरल अमर सिंह थापा ने 18वीं शताब्दी में कराया था। हिन्दू पौराणिक कथाओ के अनुसार गंगा ब्रह्मा जी की बेटी है। वाल्मीकि रामायण में गंगा को राजा हिमायत और रानी मेनका की बेटी के रूप में दर्शाया गया है। वह भगवान शिव की पत्नी पार्वती जी की बहन भी है। हिन्दू इतिहास के अनुसार, देवी गंगा ने राजा भागीरथ की वर्षो की तपस्या के बाद उनके पूर्वजो के पापो को मिटाने के के लिए एक नदी का रूप लिया। गंगोत्री मंदिर भागीरथी शिला के पास बनाया गया है। इस स्तम्भ को वह स्थान माना जाता है जहाँ राजा भागीरथ ने भगवान शिव की पूजा की थी और उनसे गंगा के तेज प्रवाह को सहने का वरदान माँगा था। गंगोत्री में स्थित पांडव गुफा वह स्थान है जहाँ महाकाव्य महाभारत के अंतिम चरण के दौरान पांडवो ने मोक्ष के लिए ध्यान किया था। गंगोत्री में सर्दियाँ शुरू होने के दौरान एक प्राकृतिक शिला शिवलिंग के आकार का देखा जा सकता है। लेजेंड्स के अनुसार यह वह स्थान है जहां शिव जी ने गंगा को अपनी जटाओं से प्रवाहित होने की अनुमति दी थी, और गंगा के प्रवाह को स्थिर कर दिया था।

एक अद्भुत दर्शन के बाद आप गंगा नदी के समीप घाट पर जा सकते हो। गंगोत्री मंदिर, भागीरथी नदी के बाएं किनारे पर स्थित है। जब नदी देवप्रयाग पहुँच कर अलकनंदा नदी से मिलती है, तब इसे गंगा के नाम से पुकारा जाता है। इस स्थान पर श्रद्धालु माँ गंगा की पूजा करते है और पवित्र नदी में डुबकी लगाते है। यह माना जाता है कि पवित्र गंगा नदी में डुबकी लगाने से मनुष्य की आत्मा की शुद्धि होती है। यहाँ एकत्रित हुए गंगा के जल को अमृत माना जाता है, लोग इस जल को एकत्रित करते है। और शुभ काम के लिए घर ले जाते है। गंगा के पानी की शुद्धता का महत्त्व यह है कि यह पानी बोतल में रखने पर कभी खराब नहीं होता। माना जाता है कि, गंगा नदी में मृत शरीर की राख का विसर्जन आत्मा को मृत्यु और पुनर्जन्म के बंधन से मुक्ति प्रदान करता है। गंगा नदी का वास्तविक उद्गम स्थान गौमुख है। मंदिर से गौमुख 18km पैदल मार्ग है।

Kashi Vishwanath mandir
Kashi Vishwanath mandir

गंगोत्री के बाद अगला पड़ाव उत्तरकाशी का है, उत्तरकाशी में लम्बी घुमावदार सड़के है। उत्तरकाशी जो उत्तर की काशी भी कही जाती है, चारधाम यात्रा का मुख्य पड़ाव है। उत्तरकाशी में कई आश्रम और मंदिर है और नेहरू इंस्टिट्यूट ऑफ़ माउंटेनियरिंग भी है। वाराणसी के समान, उत्तरकाशी भी गंगा में स्थित है, जो वरुणावत पर्वत के बगल में स्थित है। यहाँ मणिकर्णिका घाट और एक प्रसिद्ध शिव मंदिर भी है जो काशी विश्वनाथ मंदिर को समर्पित है। इस मंदिर में कई शादियों का आयोजन किया जाता है। कहा जाता है की मंदिर का निर्माण ऋषि परशुराम जी ने कराया था।

भगवान शिव कलयुग के दूसरे चरण में यहां विराजते है। जब वाराणसी गंगा में समां जाएगी, तब भगवान काशी विश्वनाथ उत्तरकाशी के इसी मंदिर में आजायेंगे। इसी स्थान पर भगवान शिव ने मृत्यु के देवता यम से, मार्कण्डेय ऋषि के प्राणों की रक्षा की थी। भगवान शिव इसी स्थान पर गहन ध्यान में चले गए और तबसे मानव जाती पर उनका आशीर्वाद बरस रहा है। गर्भ ग्रह में देवी पार्वती और भगवान गणेश है, और नंदी बाहरी कक्ष में है। देवी पार्वती को समर्पित शक्ति मंदिर कशी मंदिर के ठीक सामने स्थित है। यह एक बहुत प्राचीन मंदिर है, और माँ शक्ति का एक विशाल त्रिशूल यहाँ मौजूद है।

चारधाम यात्रा का तीसरा धाम

यहाँ से केदारनाथ की यात्रा आप खच्चर से कर सकते हो जो गौरीकुंड से 18 किलोमीटर दूर है। खच्चर से केदारनाथ पहुँचने में 4 घंटे का समय लगता है। पैदल यात्रा करने में 7 से 8 घंटे लग जाते है। खच्चर से उतरने के बाद, मंदिर तक पहुँचने के लिए, 1 किलोमीटर की पैदल यात्रा करनी पड़ती है। केदारनाथ पहुँचने के लिए हेलीकाप्टर बहुत ही सुविधाजनक विकल्प है।आपको हेलीकाप्टर के लिए पहले से ही बुक करना होगा क्योंकि आजकल इसकी बहुत मांग है। हेलीकाप्टर सर्विस आपको मई और जून के महीने में मिल सकती है, अगस्त और सितम्बर माह में मानसून की बारिश के कारण हेलीकाप्टर सर्विस उपलब्ध नहीं होती। केदारनाथ में रात गुजरने के लिए छोटे टैंट और गेस्ट हाउस उपलब्ध है। मंदिर तक पहुँचने के लिए पिट्ठू का इस्तेमाल भी किया जाता है, नेपाली अपनी पीठ में एक छोटी टोकरी बांधकर यात्रियों को अपनी पीठ में बैठा कर मंदिर तक पहुंचाते हैं। मंदिर के बगल से मंदाकिनी नदी बहती है, जिसका उद्गम केदारनाथ मंदिर के पीछे हिमालय से है। आप केदारनाथ में 2013 की बाढ़ के दौरान हुए विनाश के दृश्य को देख सकते है। केदारनाथ मे आई आपदा से मंदिर को कोई नुकसान नहीं हुआ।

Kedarnath Dham
Kedarnath Dham

केदारनाथ मंदिर भगवान शिव के 12 ज्योतिर्लिंगों में से एक है, और चारधाम यात्रा में तीसरे स्थान में है। यह माना जाता है कि पांडवो ने मंदिर का निर्माण अपने पापों के प्रायश्चित के लिए करवाया था, और यह भी माना जाता है कि वर्तमान सरंचना आदि शंकराचार्य द्वारा निर्मित की गई है। केदारनाथ मंदिर से जुड़े तथ्य बहुत आकर्षित है। कहा जाता है की महाभारत युद्ध के पश्चात पांडव अपने भाइयों को मारने के बाद बहुत परेशान थे और अपने पापों का प्रायश्चित करना चाहते थे। जिसके लिए वो भगवान शिव को प्रसन्न करना चाहते थे, भगवान शिव की खोज में उन्होंने हिमालय की यात्रा की परन्तु भगवान शिव उनसे अप्रसन्न थे इसलिए वे उनके सामने प्रकट नहीं होना चाहते थे। वह काशी चले गए और केदारनाथ के पास बेल के रूप में प्रकट हुए और अन्य पशुओ में जा मिले, शहर को तबसे गुप्तकाशी कहा जाता है। फिर पांडव भगवान शिव की तलाश में गौरीकुंड पहुँच गए, जहाँ उन्होंने एक असामान्य बेल देखा, अत: भीम ने अपना विशाल रूप धारण कर दो पहाड़ों पर पैर फैला दिया। अन्य सब गाय-बैल और भैंसे तो निकल गए, पर शंकर जी रूपी भैंसे पैर के नीचे से जाने को तैयार नहीं हुए। भीम ने भगवान् शिव को पहचान लिया और बलपूर्वक इस भैंस पर झपटे, लेकिन भैंस भूमि में अंतर्ध्यान होने लगा परन्तु तब तक भीम ने बैल की त्रिकोणात्मक पीठ का भाग पकड़ लिया। भगवान शंकर पांडवों की भक्ति और दृढ संकल्प देखकर प्रसन्न हो गए और सभी पांडवो को दर्शन देकर उनके पापो का नाश किया और वही ज्योतिर्लिंग में परिवर्तित हो गए, उसी समय से भगवान शंकर भैंस की पीठ की आकृति-पिंड के रूप में श्री केदारनाथ में पूजे जाते हैं। यह माना जाता है की केदारनाथ के दर्शन से मोक्ष की प्राप्ति होती है।

केदारखंड में उल्लेख है, ‘अकृत्वा दर्शनम् वैश्वय केदारस्याघनाशिन:, यो गच्छेद् बदरी तस्य यात्रा निष्फलताम् व्रजेत्’ अर्थात् बिना केदारनाथ भगवान के दर्शन किए यदि कोई बदरीनाथ क्षेत्र की यात्रा करता है तो उसकी यात्रा व्यर्थ हो जाती है।

Triyugi Narayan Mandir
Triyugi Narayan Mandir

त्रियुगी नारायण एक प्राचीन मंदिर है जो भगवान विष्णु जी को समप्रित है। यह सीतापुर के पास स्थित है, जब आप केदारनाथ के दर्शन करे तो यहाँ भी अवश्य आएं। इस स्थान की मान्यता यह है कि भगवान शिव और पार्वती जी के विवाह के दौरान भगवान विष्णु इसी स्थान पर साक्षी बने थे। इस मंदिर की विशेषता एक सतत आग भी है जो मंदिर के सामने जलती रहती है, मान्यता है कि यह आग दिव्य विवाह के समय से ही जल रही है इसी वजह से इस मंदिर को अखंड धुनि मंदिर के नाम से भी जाना जाता है।
त्रियुगी नारायण शब्द तीन शब्दों से मिलकर बना है, त्रि का अर्थ है तीन, युगी का अर्थ है युग, और नारायण का अर्थ विष्णु जी से है। तीर्थ यात्री हवन कुंड में आग प्रजवल्लित करने के लिए लकड़ी डालते है। हिन्दू पौराणिक कथाओ के अनुसार देवी पार्वती राजा हिमवत की बेटी थी जो की हिमालय की पहचान है। पार्वती ने गौरीकुंड में तपस्या कर शिव जी को प्रसन्न किया जो त्रियुगी नारायण मंदिर से 5km दूर है। त्रियुगी जाने वाले तीर्थयात्री गौरीकुंड अवश्य जाते है। शास्त्र के अनुसार इस मंदिर मे आने वाले यात्री जलती हुई अग्नि की राख को पवित्र मानते है और इसे अपने साथ ले जाते है। यह माना जाता है की इस राख को रखने से वैवाहिक जीवन समृद्ध होता है।

Vishvnath Mandir
Vishvnath Mandir

गुप्तकाशी प्रमुख मंदिरो का एक शहर है जो केदारनाथ के रास्ते में स्थित है। यह अपने प्राचीन विश्वनाथ मंदिर के लिए जाना जाता है, जो भगवान् शिव को समर्पित है। देखने में यह मंदिर वाराणसी के मंदिर के समान है। गुप्तकाशी का पौराणिक महत्व पांडवो से जुड़ा हुआ है। इसका धार्मिक महत्त्व वाराणसी के मंदिर क समान माना जाता है। पवित्र विश्वनाथ मंदिर वह स्थान है जहाँ भगवान शिव ने पार्वती जी के सामने विवाह का प्रस्ताव रखा था। यह वह स्थान है जब पांडवो के द्वारा पीछा किया जाने पर भगवन शिव यहाँ से लुप्त हो गए, शिव जी के लुप्त होने से इस जगह का नाम गुप्तकाशी पड़ गया।

Omkareshwar Mandir
Omkareshwar Mandir

उखीमठ केदारनाथ के रास्ते में एक छोटा सा शहर है जो एक तीर्थस्थल भी है। सर्दियों के दौरान केदारनाथ और मध्यमहेश्वर से मूर्तियों को उखीमठ लाया जाता है और फिर 6 महीनों तक यहीं इनकी पूजा होती है। विभिन्न क्षेत्रों में घूमने के लिए उखीमठ ही एक केंद्र स्थल है। यहीं से मध्यमहेश्वर जो दूसरा केदार है और तुंगनाथ जो तीसरा केदार है, को घूमने के लिए जाया जा सकता है। भगवान केदारनाथ की शीतकालीन पूजा और भगवान ओम्कारेश्वर की साल भर की पूजा यहाँ की जाती है।

अंतिम धाम बद्रीनाथ मंदिर है। रस्ते में हनुमान चट्टी मंदिर है, जहाँ सब लोग बद्रीनाथ मंदिर जाने से पहले हनुमान जी का आशीर्वाद लेते है। इसी जगह पर, महाभारत में हनुमान जी के द्वारा भीम को किसी का अपमान ना करने का पाठ पढ़ाया गया था।

चारधाम यात्रा का चौथा धाम

बद्रीनाथ हिन्दू संस्कृति के सबसे पवित्र वैष्णव तीर्थस्थलों में से एक है। मंदिर के अलावा यहाँ भव्य अलकनंदा नदी बहती है। बद्रीनाथ चारधाम यात्रा का चौथा धाम है। यह भगवान विष्णु को समर्पित 108 दिव्यदेशम का हिस्सा भी है। मंदिर में पूजा के लिए बद्रीनारायण के रूप में, विष्णु जी की 1 मीटर लम्बी और काली मूर्ति विराजमान है। इसे भगवान विष्णु की स्वयंभू प्रतिमा कहा जाता है। 

Badrinath Dham
Badrinath Dham

बद्रीनाथ मंदिर नीलकंठ पर्वत की पृष्ठभूमि के सामने नर और नारायण दो चोटियों से घिरा है। मंदिर मे केवल मई से नवम्बर के बीच ही जाया जा सकता है। सर्दियों में मौसम की वजह से यहाँ पहुंचना मुश्किल होता है इसी वजह से मंदिर बंद रहता है। मंदिर के ठीक नीचे तप्त कुंड है जो गर्म गंधक का एक स्त्रोत है जिसमे कई औषधीय गुण पाए जाते है। कई तीर्थयात्री इस गर्म तप्त कुंड में स्नान जरूर करते है। पौराणिक नदी सरस्वती की उत्पत्ति बद्रीनाथ के निकट एक ग्लेशियर से हुई है। यह नदी अलकनंदा में मिलती है और लुप्त हो जाती है। इलाहबाद में सरस्वती, गंगा और यमुना के साथ पवित्र त्रिवेणी संगम में जा मिलती है।

Narsingh Mandir
Narsingh Mandir

स्कंदपुराण के अनुसार 9वीं शताब्दी में आदि शंकराचार्य को भगवान विष्णु जी की एक बड़ी काली मूर्ति मिली थी जो नारद कुंड के किनारे पाई गई। उन्होंने तप्त कुंड के निकट इस मूर्ति को स्थापित किया। जिसे बाद में बद्रीनाथ के रूप में पूजा जाने लगा। लेजेंड्स के अनुसार, भगवान विष्णु थुलिंग से दूर इस स्थान पर ध्यान करने बैठे थे। थुलिंग हिमालय में एक जगह है जो मांस खाने वाले भिक्षुओ और अयोग्य लोगो से दूषित है। ध्यान के दौरान भगवन विष्णु ठन्डे मौसम से अनजान थे उनकी पत्नी ने बद्री वृक्ष के रूप में उनकी सुरक्षा की। लक्ष्मी जी की भक्ति से प्रसन्न होकर विष्णु जी ने इस स्थान का नाम बद्री का आसान रखा।जोशीमठ बद्रीनाथ से आते हुए एक छोटा सा शहर है, यहाँ नरसिंह अवतार में भगवान विष्णु जी का एक मंदिर है जिसे नरसिंह मंदिर कहा जाता है। इसे शंकराचार्य द्वारा स्थापित माना जाता है। जब हर साल सर्दियों के दौरान बद्रीनाथ मंदिर के कपाट बंद होते हैं तो भगवान बद्री की मूर्ति को नरसिंह मंदिर लाया जाता है और यहीं  6 महीने तक इनकी पूजा होती है।

पांच प्रयाग अलकनंदा नदी के पांच पवित्र संगम है। संस्कृत में प्रयाग का अर्थ है बलिदान का स्थान। पंचप्रयाग के नाम इस प्रकार है –
1. विष्णु प्रयाग
2. नंदप्रयाग
3. कर्णप्रयाग
4. रुद्रप्रयाग
5. देवप्रयाग

ये पंचप्रयाग अत्यंत पवित्र और स्वर्ग का द्वार माने जाते है। इन स्थानों पर चारधाम यात्रा के दौरान ही जाया जाता है।

अलकनंदा नदी विष्णुप्रयाग में धौली गंगा नदी से जुड़ती है। अलकनंदा नदी के इस भाग को विष्णु गंगा भी कहा जाता है। पौराणिक कथा के अनुसार नारद ने इस संगम पर भगवान विष्णु की पूजा की थी।

नंदप्रयाग दूसरा प्रयाग है, जहाँ मन्दाकिनी नदी मुख्य अलकनंदा नदी से मिलती है। संगम का नाम यादव राजा नन्द के नाम पर पड़ा जो भगवान कृष्ण के पालक थे। यहाँ गोपाल का एक मंदिर है जो कृष्ण का प्रतिरूप है।

कर्णप्रयाग वह स्थान है जहा अलकनंदा नदी पिंडर नदी जुड़ती है। महाकाव्य महाभारत में यह उल्लेख है कि कर्ण ने यहाँ तपस्या की थी और अपने पिता सूर्यदेव से कवच और कुण्डल प्राप्त किये थे जो अविनाशी थे। इस प्रकार इस संगम का नाम कर्णप्रयाग पड़ा। हाल ही में बने मंदिर में देवी उमा की मूर्ति है जो की हिमालय की पुत्री है। पत्थर की इस मूर्ति का निर्माण गुरु आदि शंकराचार्य द्वारा किया गया था।
मंदिर के किनारे से सीढ़ियों की कतार, संगम बिंदु की और जाती है। सीढ़ियों के नीचे शिव जी के छोटे छोटे पवित्र धाम और विनायक शिला है जिसे गणेश पत्थर कहा जाता है। माना जाता है की ये हर खतरे से सुरक्षा प्रदान करते है।

रुद्रप्रयाग में अलकनंदा, मन्दाकिनी से मिलती है। इस संगम का नाम भगवान शिव के नाम पर रखा गया है। एक प्रचलित कथा अनुसार भगवान शिव ने तांडव किया था। तांडव एक ओजस्वी नृत्य है जो सर्जन, संरक्षण और विघटन के चक्र का स्त्रोत है। शिव जी ने यहाँ अपना पसंदीदा वाद्य यंत्र रुद्रवीणा बजाया था। रुद्रनाथ और देवी चामुंडा को समर्पित मंदिर यहाँ स्थित है।

देवप्रयाग दो प्रमुख नदियों भागीरथी (गंगा की प्रमुख धारा) और अलकनंदा का संगम है, संगम के बाद इस नदी को गंगा के नाम से जाना जाता है। इस संगम की पवित्रता को इलाहबाद की गंगा यमुना सरस्वती के संगम के तुल्य माना जाता है। बहुत से प्रसिद्ध राजाओ ने यहाँ तपस्या की। किवदंतियो के अनुसार इसी स्थान पर भगवान विष्णु जी ने, दानवो के राजा बाली से तीन कदम भूमि दान में मांगी थी। यह भी कहा जाता है कि राम जी ने मोक्ष प्राप्त करने से पहले इसी स्थान से लुप्त हो गए थे। वैष्णव इस स्थान को 108 दिव्यदेशम में से एक मानते हैं, और अपने जीवन में इस तीर्थ यात्रा को एक बार जरूर करना चाहते है। देवप्रयाग मंदिर से एक सीढ़ी भागीरथी और अलकनंदा नदी के संगम की और जाती है। जहाँ भागीरथी नदी का साफ पानी अलकनंदा नदी के मटमैले पानी से मिलता है और हिन्दुओं की सबसे पवित्र नदी के रूप में अवतरित होता है।

Dhari Devi Mandir
Dhari Devi Mandir

धारी देवी श्रीनगर के रास्ते में अलकनंदा नदी के तट पर बना मंदिर है। मूर्ति का ऊपरी भाग माँ धारी का है। यहाँ के लोगो के अनुसार ये मूर्ति दिन में कन्या युवती और एक वृद्धा का रूप बदलती है। मूर्ति के नीचे का आधा भाग कालीमठ मे है, जहाँ माँ काली के रूप में इनकी पूजा होती है। यह तीर्थ स्थल भारत के 108 शक्तिपीठो में से एक है। माँ काली धारी देवी की अभिव्यक्ति चारों धामों की रक्षक के रूप में होती है। विश्वास करने वालो के अनुसार, उत्तराखंड में 2003 में आई आपदा का कारण माँ धारी देवी के क्रोध का प्रकोप था, क्योंकि हाईडल प्रोजेक्ट में रास्ता बनाने के लिए माँ की मूर्ति को उनके मूल स्थान से स्थानांतरित किया गया था।

Rishikesh
Rishikesh

ऋषिकेश : ऋषिकेश चारधाम यात्रा का अंतिम पड़ाव है। लक्ष्मण मंदिर गंगा नदी के तट पर लोकप्रिय मंदिर है। यह वही स्थान माना जाता है जहाँ लक्ष्मण जी ने आध्यात्मिक ज्ञान प्राप्त करने के लिए ध्यान लगाया था। कई लोगो का मानना है की राम और लक्ष्मण जी ने यहाँ जुट के पुल्ल का निर्माण किया था। रिवर राफ्टिंग ऋषिकेश में एक एडवेंचर लोकप्रिय गतिविधि है। लक्ष्मण झूला ऋषिकेश के प्रतिस्थित स्थलों में से एक है। प्रसिद्ध 13 मंजिला त्रयंबकेश्वर मंदिर भी लक्ष्मण झूला के पास है।
रामझूला गंगा नदी के पार एक लोहे का लटकने वाला पुल है। लक्ष्मण झूला के समान यह पुल ऋषिकेश के प्रतिष्ठित स्थलों में से एक है। गंगा के दोनों किनारो पर कई हिन्दू आश्रम और धार्मिक स्थल मौजूद है।

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